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पहला प्यार कॉलम में आज प्रस्तुत है लेखिका शबनम खान के पहले प्यार की दास्तान -उसका जाना वैसा जाना नहीं था जैसा ‘ब्रेकअप’ में होता है…

                                         -शबनम खान
(कहानियां लिखती हैं और लोग इन्हें रेडियो पर सुनते हैं. पत्रकार, अनुवादक और लेखिका.)
उसका जाना वैसा जाना नहीं था जैसा ‘ब्रेकअप’ में होता है…
आज की जेनरेशन को सुनने में कितना चीज़ी लगता है न, एक तरफ़ा प्यार! सब कुछ जल्दी-जल्दी कर लेने की चाहत रखने वाली इस जेनरेशन में, मुझे फ़ुर्सत से एक तरफ़ा प्यार निभाने की चाहत नहीं दिखती. वैसे, अच्छा है. हर जनरेशन नई सोच लाती है, और वो उस वक्त में ढली हुई होती है. मैं बहुत उम्रदराज़ तो नहीं हूं, लेकिन इस जनरेशन के कुछ शुरुआती लोगों में से हूं. जो ख़ुद को पिछली और इस जेनरेशन के बीच फ़ंसा-फ़ंसा पाते हैं. प्यार मोहब्बत के मामले में मैं ‘अब’ क्या सोचती हूं, उसे जाने दीजिए. इस उम्र में अप्रोच काफ़ी प्रैक्टिकल हो जाती है, लेकिन 17 साल की उम्र प्रैक्टिकल होना कहां जानती है? 17 की थी मैं, जब मुझे पहला प्यार हुआ. कहते हैं, पहला प्यार ज़िंदगी भर याद रहता है. ग़लत कहते हैं. पहला दूसरा तीसरा, हर प्यार, याद रहता है. लेकिन अगर प्यार ‘एक तरफ़ा’ हो तो वो बाकी सारे प्यार के रिश्तों से अलग, आपके दिल में एक ऐसा कोना बना लेता है, जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आप झांक सकते हैं. वरना बाकी प्यार के रिश्ते तो दो लोगों की मिल्कियत होती है. बहरहाल, मेरे पास भी, दिल में, एक ऐसा कोना है.
लोग अमूमन एक तरफ़ा प्यार से दर्द, तकलीफ़, जुदाई को जोड़ते हैं. लेकिन मैं अपने एक तरफ़ा प्यार को बेहद ख़ूबसूरत एहसास मानती हूं. ऐसा नहीं है जब मुझे उस शख़्स से मुहब्बत थी, तो मैं हमेशा बहुत खुश रहती थी. मैंने उसके लिए बहुत आंसू बहाए. मेरी हर ख़्वाहिश उसे अपनी ज़िंदगी से जोड़ने की थी, तब. बहुत चिड़चिड़ाई हूं. उसकी तरफदारी करते-करते दोस्तों से लड़ी भी थी. लेकिन, जब आप ज़िंदगी में आगे बढ़ जाते हैं, और फ़ुर्सत भरी किसी दुपहर में पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वो सब दुख तकलीफ़ जो आपने झेले थे, आपके दिल को खुशियों से भर देते हैं.
कॉलेज के दिन थे और हम दोनों एक क्लास में थे. यानी रोज़ आमना सामना होता था. अगर मेरी क्लास में 50 स्टूडेंट्स थे, तो 48 से मेरी दोस्ती थी. सिर्फ़ एक उससे नहीं. उससे दोस्ती कभी करनी ही नहीं चाही थी. हर प्यार की शुरुआत दोस्ती से नहीं होती, शायद इसलिए. हम अक्सर आस-पास की बैंच पर बैठते थे, मैं उसकी तरफ़ मुड़कर देखना चाहती थी लेकिन कभी देख नहीं पाई. उन दिनों प्यार का भूत सवार तो था, लेकिन ‘आत्मसम्मान’ मेरी लिए तब भी बड़ी चीज़ थी. मैं उस लड़के को चाहती थी, लेकिन उसे ये बताना नहीं चाहती थी कि मैं उसे चाहती हूं. बल्कि उस वक्त का इंतज़ार करना चाहती थी, कि उसे मुझसे प्यार हो जाए. मैं ये आज भी ठीक से नहीं जानती कि उसने कभी वो सब नोटिस भी किया या नहीं. और शायद, मैं जानना भी नहीं चाहती. मेरे लिए वो दिन फ़्रेम में जड़ी एक खूबसूरत तस्वीर की तरह हैं. तस्वीर, जो हिलती-डुलती नहीं, बदलती नहीं, उस पर किसी हालात का फ़र्क नहीं पड़ता.
बहुत सी प्यार की कहानियां एक तरफा होकर सिर्फ़ इसलिए रह जाती है क्योंकि सामने वाला न कह देता है. मेरी कहानी इसलिए एक तरफ़ा बनकर रह गई, क्योंकि मैंने उससे कभी पूछा ही नहीं. मैंने उसपर ज़ाहिर नहीं होने दिया. लेकिन दिल की भी अपनी खुराक होती है. हर इश्क़ करने वाला इस ‘ख़ुराक’ को महसूस करता है. उन दिनों मेरे दिल की खुराक थी उसे देखना. जितनी देर मुमकिन हो, जितनी बार हो सके. सामने से नहीं देख पाती थी इसलिए मैंने कई तरीके अपनाए. मैंने कुछ दिन उसके आने जाने का टाइम नोटिस किया, और फिर मैं उसके आने से कुछ देर पहले कॉलेज पहुंचने लगी. उसे गेट से एंट्री करते हुए देखने के लिए सामने की बिल्डिंग की दूसरी मंज़िल की गैलरी पर खड़ी हो जाती. कई बार ऐसा होता था कि वो मुझे कॉलेज से कुछ पहले, बस में बैठे बैठे दिख जाता. पैदल चलता हुआ. वो बोनस होता था. एक बार वहां देखो और एक बार कॉलेज में उसे एंट्री करते हुए. अब सोचकर हंसी आती है.
मैंने उन दिनों एक छोटी सी डायरी अपने हैंडबैग में रखनी शुरू की थी. क्योंकि मैं इस रिश्ते… अम्मममम… या इसे जो भी कहेंगे, इसे लेकिन ज़्यादा किसी से बात नहीं कर सकती थी. इसलिए मैं हर रोज़ जो महसूस करती थी, उसे देखते हुए, वो उस डायरी में लिख देती थी. वो बातें बहुत बेसिक होती थीं. जैसे “आज उसने चेक की नीली शर्ट पहनी थी, उसमें सिलवटें बहुत थी, शायद प्रेस नहीं की होगी.” हम अक्सर कैंटीन में टकरा जाते. टकराते क्या, मतलब एक ही वक्त में दोनों कैंटीन में होते. तब मेरा पूरा ध्यान ये जानने में लगा रहता कि वो क्या खाता है. मुझे याद है एक बार मुझे ‘लगा’ था कि इसे राजमा चावल बहुत पसंद है. इसके बाद मैंने हफ्तों वहां सिर्फ राजमा चावल खाया. लेकिन फिर एक दिन मैंने उसे डोसा खाते देख लिया. मैंने लाइब्रेरी में पढ़ना सिर्फ़ इसलिए शुरू किया कि वो वहां रोज़ पढ़ने जाता था. मैं कहीं दूर सीट ले लेती थी, जहां से वो मुझे दिखता रहे, लेकिन मैं उसे दिखाई न दूं.
एक तरफ़ा प्यार आपको सब्र और इंतज़ार कराना सिखा देता है. आपको ‘न’ सुनना बर्दाश्त करना सिखा देता है. ज़रूरी नहीं एक तरफ़ा प्यार में इंसान लुट जाए, अपने आप को खो दे. जिसने एक बार प्यार करना सीख लिया, वो जिंदगी में फिर कभी अकेला नहीं होता. वो शख़्स जिससे मैं बेपनाह प्यार करती थी, वो मेरी आंखों के सामने सिर्फ़ एक साल रहा. मैं सोचती रही कि अभी तो तीन साल हैं कॉलेज के, एक न एक दिन वो भी मुझसे प्यार कर बैठेगा लेकिन अचानक से उसके ट्रांसफ़र ले लेने की ख़बर आ गई. आखिरी बार भी उसे देखने का मौका नहीं मिला.
उन दिनों मैं किस्मत में बहुत यकीन रखती थी. मेरा मानना था कि किस्मत ने ही मुझे और उस शख़्स को मिलवाया है. किस्मत से हम दोनों के ‘रोल नंबर’ आसपास के हैं. किस्मत से, पहले साल में, हमारे नंबर बिल्कुल एक जैसे आए. इसलिए जब बिना ये राज़ खुले कि मैं उसे कितना चाहती हूं, वो कॉलेज से चला गया, तो मैंने इसे भी किस्मत माना. लेकिन ऐसा नहीं था कि उसके जाने के बाद मैंने उसे पाने की ख्वाहिश छोड़ दी, 17 से 18 होने पर इतनी भी मैच्योर नहीं हो गई थी. बल्कि तब तो अपनी मोहब्बत अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई नज़र आती थी और इसीलिए ही, मैंने अपने आप को इस खुशफ़हमी में रखना शुरू कर दिया कि अगर किस्मत हुई तो हम फिर मिलेंगे. वाकई, किस्मत ने हमें मिलाया. तकरीबन दो साल बाद, एक प्रोग्राम में हम आमने सामने थे. लेकिन तब भी, वो मुझे देखकर मुस्कुराया तक नहीं. कोई बात नहीं हुई.
ज़िंदगी आगे बढ़ती चली गई और हम वो मुझसे दूर होता गया. उसका जाना वैसा जाना नहीं था जैसा ‘ब्रेकअप’ में होता है, वो तो मेरी ज़िंदगी में कब आया कब गया, ये उसे पता भी नहीं चला. अगर सोचा जाए, तो जो था मेरी फैंटेसी थी. जिसका कुछ हिस्सा मैंने जिया, और कुछ हिस्सा छूट गया. झटके से वो जाता तो शायद संभलना मुश्किल होता, लेकिन इस रिश्ते में शुरू से मैं अकेली थी, तो फिर अकेलापन मुझे क्या डराता? और ख़याल? वो कौन किसी से छीन पाया है. जब भी किसी को एक तरफ़ा प्यार पर कुछ कहते सुनती हूं, अपने दिल के उस कोने को हल्के से सहला देती हूं. वो अहसास अपनी गहरी नींद से कुछ पल के लिए जागता है, अंगड़ाई लेता है, और फिर वापस सो जाता है.


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