प्रतिमा त्रिपाठी की कविता -उत्थान



प्रगति और उत्थान में
समझे महीन अंतर को
यदि प्रगति हो सद्गति साथ
उत्थान-उन्नति के मन्तर को।

बेलगाम दौड़ती दुनिया
खोकर होशोहवाश
सबकी ख्वाइस चाँद छूने की
कौन चले सीधी राह।

परवाह किसे है अति की
सभ्यता संस्कृति की
आचरण के उन्नति की
समाज के उत्थान की
कमजोर के सम्मान की।

अभिजात्य जीवन शैली
मिट्टी से कटे बृक्ष सामान
अर्थ लालसा ले डूबता
अथक परिश्रम का शुभ परिणाम।

उत्थान तभी सम्यक होगा
जब किसान का होगा मान।
मजदूर भय से ना जिये
जाने कल मिले ना काम।

निर्भय होकर घर से निकले
महिला पुरुष सभी सामान
बेटियां सुरक्षित रहे हर जगह
घर स्कूल ऑफिस या खेत खलिहान।

प्रतिमा त्रिपाठी।
राँची झारखण्ड।

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